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दुआ

एक अजनबी शहर की किसी वीरान स्टेशन पर, बड़े विशाल छत के नीचे बैठा, एक सूक्ष्म इंसान, जो उस अंजानेपन को मिटने में लगा हो, जिसे आती जाती निगाहों ने, खीच दी है उसकी ललाट पर। और इतने मे, कोई धीरे धीरे आकर लग जाता है प्लेटफार्म पे बिना शोर किये, और पल भर में, आती हुई किसी हॉर्न की आवाज पर साइड दे देता है  आने वाली  local ट्रेन को, ट्रेन क दरवाजे की धक्का मुक्की में, वो सूक्ष्म होने वाला एहसास कहीं प्लेटफार्म पर ही दौड़ता रह जाता है , ट्रेन की गेट पर पर खड़े, अजीब चेहरों की परछाइयों मे हाथ बटुआ टटोल लेता है और ठंडी हवा जिस्म, और इमारतों की खिड़कियों से घूरती रौशनी के दरम्यान, अगले स्टेशन पर, पड़ोस में खड़ा सुकून उतर जाता है कंधे पर धक्का देकर, earphone पर पीकू वाला 'बेजबान' गाना रात की तरह ढलता चला जाता है| पर वो अभी भी साथ है। पर वो है कौन? जिस्म ? तो आखे क्यों नहीं फारकती उसकी, उसने हाथ क्यों नहीं बढ़ाया अब तक। रूह? होती क्या है वो? न देखी  कभी,न महसूस किया कभी. खुदा? उसकी तरह निराकार तो है, पर मगर म...

हेडलाइट

तनहा स्याह राहो में , अक्सर  ऑन कर लेता हूँ, और चलता चला जाता हूँ। कभी कभी उजालों में , बेजरूरत भी, आन रह जाती हो तुम। यु ही कोई देख लेता है, और टोंक देता है , ऑफ कर लेता हूँ झटके से। मेरे बाइक की हेडलाइट, और तेरी खुसनुमा यादें, कित्ती मिलती जुलती हैं न।

बीमार कुत्ता

वो बीमार कुत्ता  जो दरवाजे के पास, गोल गोल चक्कर लगाता था,  शून्य के इर्द-गिर्द! गिर जाता था, फिर होश संभाल कर, घूमने लगता था, उसे जाना नही था कहीं, बस यूँ  ही काट देनी थी, अपनी बची खुची ज़िन्दगी। आज किसी भीड़ मे जब , एक ख्वाब से, हाथ छुड़ा कर घर आया, तो बड़ी देर तक जेहन में,  वो कुत्ता, गोल गोल घूमता रहा ।

Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता, के किन अजीब रस्तों पे चले जा रहा हूँ, के कोई बुने जा रहा है , मैने सुने जा रहा हूँ, क्योंकि, जो तलाश है, वो मंज़िल नही, जो मंज़िल है वहाँ जाना नही, जो खो दिया है, उसे खोना ना था. जो हासिल  सा है, उसे पाना नही. आसमान की तरफ तो देखा होगा, कभी कभी आपको नही लगता, के बस ये जमी सरक रही है, आप रुके से हैं. Trade mill पे तो चला होगा, जो एक पाँव आगे निकल जाता है तो दूजा पीछे, और हम इसी एहसास से थक जाते हैं  की बड़ी दूर निकल आए. खैर मुझे यकीन हैं, आप भी बूझ गये होंगे, के ज़िंदगी भी    Keyser Söze   वाला खेल  है, पर रहने दीजिए, आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!

उसके बचाव में

हाँ, बिल्कुल ज़ायज़ था, तेरा गुस्से मे तकिया फाड़ देना, और बिखेर देना रूई को, आसमान मे चारो तरफ, के आख़िर किस बिनाह पर, तुझे कोसते चलते हैं लोग, के जबकि मैने खुद देखी है, सीधी सटीक वर्गाकार खेतों की मेडे, और सलीके से चुपचाप बहती नदी, स्लो मोशन मे रेंगती मोटर कारे, और सन्नाटे मे डूबा एक पूरा सहर. ना कोलाहल, न कोहराम, ना अल्लाह , ना राम, ना दीवारे, ना दरवाजे, ना जनता, ना महाराजे, ना  शोर, ना संवाद, ना  गम, ना उन्माद. और जबकि मेरा जहाज़ , तो ज़रा सी उँचाई पे रहा होगा, पर तू तो  दूर,  कहीं दूर, बहुत उपर बैठता है ना! 

हासिए पर !

इश्क़ और सियासत मे एक समानता है, वो आपकी समझ-बूझ पर बट्टा लगा देती है   कुछ ऐसे की पता ही नही चलता की इस तरफ या उस तरफ.!  फ़र्क बस इतना है की इश्क़ मे ये अनायास होता है,और सियासत मे अक्सर तैयारी से. ऐसे ही हासिये पे अटके कई सारे हालत आपके समक्ष : मुड़ के देखा था उसने जाते जाते, खैर हम कह भी उनसे क्या पाते, उनकी आँखों मे डबडाबाते  हुए, कुछ सवाल से तो थे, पर सवाल नही.  घरूब-ए-आफताब [ढलता सूरज] देखा था, उनकी उंगलियों के पोरों से, तब से बगिया मे फूल उरहुल के,  थे तनिक लाल से , पर लाल नही. इक दफ़ा  इन्क़िलाब गाया था, सियासतदारों की तंग गलियों मे, थी आरजू की कुछ बदल डालूं, तरीके ज़रा  बवाल से थे, पर बवाल नही. जिनकी जेबें टटोल कर तुमने, रखा था हांसियों, पे सालों  तक, उनकी मुट्ठी मे वोट थे लेकिन, लगते भले कंगाल से थे, पर कंगाल नही. मेरा घर देख कर जो पूछे कभी , शहरवालों !  जो कोई हाल मेरा, उससे कहना कि ना वो फ़िक्र करे, हैं तनिक बेहाल से, पर बेहाल नही!

बेईमान शायर

पहली दो पंक्तियाँ श्रीमान सचिन तेंदुलकर को समर्पित करते हुए... देखा है लड़कपन को मैने ,रफ़्तारों से सौदा करते, [साभार youtube] देखी है आकुलता मैने ,चालिस की आँखों से झरते, देखी है दृढ़ता भावों मे, देखा है पौरुष का तांडव,  देखी है भागीरथ की क्षमता, देखा है अविचलित मानव, पर शीश झुकाए निकल पॅडू,  जब सीधी समतल  राहों पर, तुम मेरे शिथिल इरादों को, हिम्मत का ना वास्ता देना. मैं एक "बेईमान शायर" हूँ, मेरे ख़यालों को ना रास्ता देना. बड़ी पैनी नज़रों से मैने, ढूंढी जीवन की सार्थकता, कुछ  कम मादक सी लगी मुझे ,जाने क्यों  मधु की मादकता, मृग मरीचिका सी लगी मुझे खुशियों की हर एक खोज  प्रिय,  भौतिकतावादी  दलदल मे ,फँसती धँसती सी  सांसारिकता.  किंतु मन मेरा जो उड़ कर, वापिस जा बैठे नोटों पर, मेरी अपसारित चिंतन को , बुद्धा का ना वास्ता देना, मैं एक "बेईमान शायर" हूँ, मेरे ख़यालों को ना रास्ता देना. बड़ा रोचक लगता है मुझको लोगों के जीवन मे तकना, लोगों की पीड़, प्रयत्नो से अपने  अनुभव घट को भरना ...

अठन्नीयाँ

खूँटी पर टॅंगी पिताजी के पैंट की जेब मे, ऐरियाँ उचकाकर, जब भी हाथ सरकाता रहा, नोटों के बीच दुबकी हुई, अठन्नी हाथ आती रही, जैसे आज फिर  आई हो क्लास, बिना होमवर्क किए, और छुप कर जा बैठी हो, कोने वाली सीट पर ! और हर दफ़ा, बहुतेरे इरादे किए, के गोलगप्पे खा आऊंगा चौक पर से या, बानिए की दुकान से, खरीद लाऊँगा चूरन की पूडिया, क्योंकि सोनपापडी वाला अठन्नी की, बस चुटकी भर देता है, और गुब्बारे से तो गुड़िया खेलती है, मैं तो अब स्याना हो गया हूँ. या फिर, ऐसा करता हूँ  के चुप चाप रख लेता हूँ इसे, अपने बस्ते की उपर वाली चैन मे, के जब भी आनमने ढंग से, पेंसिल ढूँढने कुलबुलाएँगी उंगलियाँ, शायद सिहर जाएँगी, इसके शीतल स्पर्श से. पर अभी अभी  वो बर्फ वाला आया था, तपती दुपहरी मे, अपना तीन पहिए वाली गाड़ी लुढ़काते, और ले गया है वो अठन्नी , उस गुलाबी वाली बर्फ के बदले, जिसकी बस सीक़  बची है, बर्फ पिघल चुकी है, कुछ ज़बान पर, कुछ हाथो मे, और फिर से अठन्नी हो गयी है, इस जेब से उस जेब, ठीक उम्र की ...

एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह! या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह! या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी . या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़. गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!

बहाना

उस रात बस हवाएँ चली थी, बिना बारिस के, और रह गया था चाँद सूखा सूखा. वक़्त जैसे-तैसे सरक रहा था,  बड़ी मशक्कत से, हौले हौले , केंचुए सा! बड़ी देर तक  देखता रहा मैं, अपने ख़यालों की छत से, बूँद बूँद टपकते अंधेरे, और वो  बेज़ार सा ,बिखरा हुआ मोम जो शायद सह नही पाया था, लौ की तपिश ! और वो बैठी रही बेफ़िक्र.. मेरे सिरहाने, के जैसे कोई जल्दी ना हो, और मालूम हो जिसे के जो छू दिया मुझको तो तब्दील हो जाऊँगा रेत के ढेर में! पर याद है उस रोज़, अभी वक़्त था भोर होने में, आसमान ज़रा साफ हो चला था, और ज्यों ही हाथ बढ़ाया था मैने उसकी ओर, तो एक ख़याल सा टकराया था. की  क्या जवाब दूँगा उसे, जो  जो कभी मिलेगा मुझे, के जिसने ज़िक्र किया था मेरा और मैं आ पहुचा था, और  यकीन था उसे कि बड़ी लंबी उमर है मेरी. उस रोज़ कहा था मैने के,ऐ ख़ुदकुशी! साँस लेना भी अजीब आदत है, जाते जाते ही जाती है. तू आज फिर लौट जा खाली हाथ, जीने का एक बहाना , अभी और बाकी है.

तीलियाँ

यहीं कहीं रखी थी , वो माचिस की डिबिया, खिड़की से उठा कर, के जाने कब कुछ पथ भ्रष्‍ट बूंदे, इसकी हस्ती के साथ खिलवाड़ कर बैठें. बिल्कुल, इंसानों से जुदा हैं ज़रा, ये बर्बाद होकर नम नही होती, नम होकर बर्बाद हो जाती हैं! बहुत तो नही, पर चंद तीलियाँ रही होंगी, यूँ ही पड़ी होंगी, जल जाने की फिराक़ में, पर अब ये शायद नही होगा, हालाकी किसी को फ़र्क़ भी नही पड़ता, और किसे फ़र्क़ पड़ जाए,  तो हमें फ़र्क़ पड़ता है? हाँ ! कभी कभी लगता है, कि, जो हमारी कोशिशें सही पड़ती, तो रोशन करने वाली इन तीलियों के हिस्से, गुमनामी के अंधेरे नही आते, मुक़्क़मल हो जाती शायद इनकी भी ज़िंदगी. ऐ उपरवाले ! जो गर देख रहा है तू , कही हमें देख कर भी तुझे, ऐसा ही तो नही लगता.

अनायास!

एक ख़याल, किसी टूटे पत्ते सा, चल पड़ा है, हवाओं के हिचकोलों संग, गुलाटियाँ ख़ाता हुआ, दिशाहीन ! बस खो जाने, कई सारे गिरे पत्तों मे, करके तय, आदि से अंत का फासला, देख जाने कितने मौसम, लक्ष्यहीन!  ज़मीं का ज़ोर है शायद, शायद फ़िज़ा की साज़िश, या फिर वक़्त का सितम एक और पत्ता टूटा है अभी,  अनायास!

बदलाव

Patratu Thermal Power Station तुम्हारा ख़याल है  ,कुछ भी तोह नहीं बदला वहीँ तोह खड़ा है वो सहतूत का पेड़ उन खट्टी शामों को शाखों  पे सजाये ये रहा चापाकल के पास इंसानों का जत्था कोक  से आज भी प्यास नहीं बुझती ना ! आज भी दिखाई देता है सड़क से  मेरे घर की  खिड़की का पल्ला बाहे फैलाए ये सड़क आज भी मिल जाती है उसी मैदान से पहली बार जहाँ घुटने  छिले थे मेरे ! कुछ तोह बदला है लेकिन झुक गया है जरा सा  सहतूत का पेड़, शायद उम्र की बोझे के तले! चापाकल  से  आखे अब  ऐसे देखती हैं , जैसे अजनबी हूँ इस राह क लिए! घुन बसते  हैं  खिड़की क पल्लों में आजकल पीपल की जड़े  भी तोह घुसपैठ कर रही है दीवारों से! क़दमों को भी गुमान होता है अपनी ताकत पर ठोकरों से भी  टूटने लगी है ये सड़क भी किनारों से! दिल कहता है फिर सब पहले सा  क्यों नहीं है? मैं कहता हूँ ,बेटे! सबकुछ वहीँ है बस  वही नहीं है!