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आम का पेड़

लोग कहते हैं कि, इसे लगाया नही था . यूँ ही फेंक दी थी गुठली, किसी ने चूस कर, और ये पनप आया था. पर मैने इसे हमेशा, बड़ा ही देखा है, बुजुर्ग सा , विशाल से तने वाला, और तने से दुविधा के मानिंद , निकली हुई  दो शाखे. उनमे  एक थी जो, आसमान छूने निकली थी, और उसपर मौसम  रंग बदलते दिखते थे, कोई मौसम उसपर मंज़रों पे, हरा रंग मल जाता था , तो कभी गुच्छों मे  लटके हुए फल दिख जाते थे, प्रदर्शनकारियों से लाल पीले. पर जो दूसरी साख  थी, उसका रुख़ ज़मीन की तरफ था, झुका हुआ था वो ज़रा, जिसपर मंज़र तो आते थे, पर चर लिए जाते थे, या फिर शिकार हो जाते थे, गुज़रने वालों के उतावलेपन का. और यही सवाल था, कि आख़िरकार   एक सी ज़मीन और, एक सी आबो हवा मे, ये कैसा बटवारा है, के किसी के हिस्से हैं तल्खियाँ  तो किसी को नाज़ों से सवाराँ है! खैर वो सवाल वक़्त से साथ, बढ़ता चला गया, वो आम का पेड़ अब बढ़कर , मेरे मुल्क जितना बड़ा हो गया है, और आज भी मैं हैरानी से यही सोचता हूँ , पत्तो...

बग़ावत

मैं वो कहाँ लिखता हूँ जो मैं लिखना चाहता हूँ, मैं वो भी नही लिखता जो आप पढ़ना चाहते हैं, हमारे दरम्यान जो बिखरे पड़े हैं, वो तो कुछ लफ्ज़ हैं जो बग़ावत कर बैठे हैं. गर मान लें इनकी तो मेरी रूह का विस्तार,  इनकी उड़ान के लिए शायद छोटा पड़ जाता  है, या शायद मेरे मन के अंधेरों में , बढ़ जाता है इनकी गुमशुदगी का एहसास. इन्हे लगता है कि बरसो से मैने बस कुचला है  इन्हे. कभी वक़्त ने नाम पर, कभी हालात का हवाला देकर ! नादान हैं, नही मालूम इनको गर्दिशे जमाने की, के धूल की परतों तले, गुज़र जाती है ज़िंदगानी भी. अंजान , के कितने महफूज़ थे ये मेरे ख़यालों मे. इन्हे अक्सर लगता था कि मैं कोई तानाशाह हूँ, मेरे लफ्ज़ तू विदा ले,और हिन्दुस्तान देख आ, लोकशाही के हालत भी कुछ  ज़्यादा  अच्छे नहीं है!  P.S. : I  am a firm believer in the idea called democracy and India. The last few  lines are inspired from the current state of affairs in our country . This is how i show my solidarity with Mr. Aseem Tr...