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बीमार कुत्ता


वो बीमार कुत्ता 
जो दरवाजे के पास,
गोल गोल चक्कर लगाता था, 
शून्य के इर्द-गिर्द!
गिर जाता था,
फिर होश संभाल कर,
घूमने लगता था,
उसे जाना नही था कहीं,
बस यूँ  ही काट देनी थी,
अपनी बची खुची ज़िन्दगी।

आज किसी भीड़ मे जब ,
एक ख्वाब से,
हाथ छुड़ा कर घर आया,
तो बड़ी देर तक जेहन में,
 वो कुत्ता,
गोल गोल घूमता रहा ।

Comments

  1. शायद वो समझता है इंसान से ज्यादा की जिंदगी और कुछ भी नहीं है ...

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    1. Shukria Sir. aapne ek nayi perspective di hai is poem ko! :)

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  2. bhai.. kahi pe interview de ke aaye kya?? :-P
    Jokes apart!! Beautifully written. Love the way things change around in the last para.

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    Replies
    1. hehe nahi bhai koi interview nahi! Thanks for the read. :)

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  3. Dark and truthful indeed.
    Reminds me of something always crawling beneath my conscience
    Always running troubled and lost at the same time
    This is my eternal confusion .....
    EITHER OR?
    But in the end I choose Neither ....

    Oh! then, someday a sudden realisation hits me hard.
    Yeah! I am an Escapist.
    I want nothing. Just a desperado. Running around to get it over with.

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  4. ahh...it hit hard...aptly explained above!!

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    Replies
    1. When more and more people relate to it, i know i m not the only one going through this. Thanks for the read! :)

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  5. I opt to be silent as poet made me strongly believe, the character in this poem is none other than me.

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
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कल की अख़बार का इंतज़ार होता था कॉँमेंट्री रेडियो पर भी सुनी जाती थी और सचिन ओपन करने आता था इश्क़ बस फ़िल्मो मे होता था असल ज़िंदगी मे तो  बस  चक्कर. आवारगी भी  खूब होता थी और पिटाई भी होती थी जमकर. तब  फ़िल्मो मे हीरो दौड़ते दौड़ते  बड़े हो जाते थे. और आज़ ..
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