Skip to main content

Posts

Showing posts with the label Darkness

मेहरबानी

एक बात बताउ ,शाब! वो उस सड़क को छोड़ कर,  तीसरी गली हैं ना साहब! जो दोनो सिरे से खुलती है, उसमे चंद कदमो पर, एक बड़ी उँची सी इमारत है यादों की. और उसके ठीक सामने एक उंघता सा, एक कमरे का मकान, जिसके आगे एक अकल का कुत्ता बिठा रखा है. जो हांफता रहता है,  घूमता रहता है,  दरवाजे के इर्द गिर्द, और चौकश हो जाता है वो ज़रा सी भी आहट पर, अगली या पिछली गली में. खुद को शेर समझता है, साहब! दरअसल बड़ी हिफ़ाज़त से रखा है कमरे को, कागज के चंद टुकड़ो पे बिखरे, कुछ गीले मोती, और फर्श पर अशरफियों से बिखरे, कुछ  अहम के टुकड़े. कोने मे औंधे मूह पडा एक जोड़ी जूता, जिसपे आज भी किसी खूबसूरत राह ही मिट्टी लगी है, ज्यों की त्यों. और बिस्तर पे करवट लेकर लेटी रहती है, कुछ घंटों की आधी-आधी नींद. और साहब !मेमशाब  खड़ी रहती है, उन खिड़की की सलाखों के पीछे. घंटों तकती हुईं सामने वाली इमारत की छत पर, चहलकदमी सी करती किसी परछाई की ओर. उसे खाँसते सुना है कभी - कभी मैने, और कभी - कभी अकल वाला कुत्ता भी  ब...

तीलियाँ

यहीं कहीं रखी थी , वो माचिस की डिबिया, खिड़की से उठा कर, के जाने कब कुछ पथ भ्रष्‍ट बूंदे, इसकी हस्ती के साथ खिलवाड़ कर बैठें. बिल्कुल, इंसानों से जुदा हैं ज़रा, ये बर्बाद होकर नम नही होती, नम होकर बर्बाद हो जाती हैं! बहुत तो नही, पर चंद तीलियाँ रही होंगी, यूँ ही पड़ी होंगी, जल जाने की फिराक़ में, पर अब ये शायद नही होगा, हालाकी किसी को फ़र्क़ भी नही पड़ता, और किसे फ़र्क़ पड़ जाए,  तो हमें फ़र्क़ पड़ता है? हाँ ! कभी कभी लगता है, कि, जो हमारी कोशिशें सही पड़ती, तो रोशन करने वाली इन तीलियों के हिस्से, गुमनामी के अंधेरे नही आते, मुक़्क़मल हो जाती शायद इनकी भी ज़िंदगी. ऐ उपरवाले ! जो गर देख रहा है तू , कही हमें देख कर भी तुझे, ऐसा ही तो नही लगता.