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बीमार कुत्ता

वो बीमार कुत्ता  जो दरवाजे के पास, गोल गोल चक्कर लगाता था,  शून्य के इर्द-गिर्द! गिर जाता था, फिर होश संभाल कर, घूमने लगता था, उसे जाना नही था कहीं, बस यूँ  ही काट देनी थी, अपनी बची खुची ज़िन्दगी। आज किसी भीड़ मे जब , एक ख्वाब से, हाथ छुड़ा कर घर आया, तो बड़ी देर तक जेहन में,  वो कुत्ता, गोल गोल घूमता रहा ।

Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता, के किन अजीब रस्तों पे चले जा रहा हूँ, के कोई बुने जा रहा है , मैने सुने जा रहा हूँ, क्योंकि, जो तलाश है, वो मंज़िल नही, जो मंज़िल है वहाँ जाना नही, जो खो दिया है, उसे खोना ना था. जो हासिल  सा है, उसे पाना नही. आसमान की तरफ तो देखा होगा, कभी कभी आपको नही लगता, के बस ये जमी सरक रही है, आप रुके से हैं. Trade mill पे तो चला होगा, जो एक पाँव आगे निकल जाता है तो दूजा पीछे, और हम इसी एहसास से थक जाते हैं  की बड़ी दूर निकल आए. खैर मुझे यकीन हैं, आप भी बूझ गये होंगे, के ज़िंदगी भी    Keyser Söze   वाला खेल  है, पर रहने दीजिए, आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!

उसके बचाव में

हाँ, बिल्कुल ज़ायज़ था, तेरा गुस्से मे तकिया फाड़ देना, और बिखेर देना रूई को, आसमान मे चारो तरफ, के आख़िर किस बिनाह पर, तुझे कोसते चलते हैं लोग, के जबकि मैने खुद देखी है, सीधी सटीक वर्गाकार खेतों की मेडे, और सलीके से चुपचाप बहती नदी, स्लो मोशन मे रेंगती मोटर कारे, और सन्नाटे मे डूबा एक पूरा सहर. ना कोलाहल, न कोहराम, ना अल्लाह , ना राम, ना दीवारे, ना दरवाजे, ना जनता, ना महाराजे, ना  शोर, ना संवाद, ना  गम, ना उन्माद. और जबकि मेरा जहाज़ , तो ज़रा सी उँचाई पे रहा होगा, पर तू तो  दूर,  कहीं दूर, बहुत उपर बैठता है ना! 

एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह! या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह! या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी . या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़. गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!

अनायास!

एक ख़याल, किसी टूटे पत्ते सा, चल पड़ा है, हवाओं के हिचकोलों संग, गुलाटियाँ ख़ाता हुआ, दिशाहीन ! बस खो जाने, कई सारे गिरे पत्तों मे, करके तय, आदि से अंत का फासला, देख जाने कितने मौसम, लक्ष्यहीन!  ज़मीं का ज़ोर है शायद, शायद फ़िज़ा की साज़िश, या फिर वक़्त का सितम एक और पत्ता टूटा है अभी,  अनायास!

कुछ भी नही!

आखें खुली ज़मान देखा रोए ,मुस्कुराए समझा क्या? कुछ भी नही! तमन्ना की जतन किए पा लिया रहा क्या? कुछ भी नही! नैना मिले इश्क़ हुआ आँसू बहे मिला क्या ? कुछ भी नही! कोशिश की चूक गये नही मिला खोया क्या? कुछ भी नही! यादे है पछ्तावे हैं साँस रुकी बचा क्या? कुछ भी नही!

नजरिया

आज फिर कोई टकरा गया मुझसे, फिर अपना नाम गम बता गया गर यकीं कर लूं उसका तोःकल जो मिला था , इसी सड़क पर , वो कौन था? शक्ल से तोः बेहतर था जरा , खुशियों का कोई सगा रहा होगा| पर हर दफा वही धोका कैसे खा जाता हूँ.. बहरूपिये वक़्त को पहचान नहीं पाता हूँ.. नजरो की खता है ना न कसूर मेरा है.. नजरिया है.. बदलता रहता है.....