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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह! या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह! या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी . या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़. गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!

कुछ भी नही!

आखें खुली ज़मान देखा रोए ,मुस्कुराए समझा क्या? कुछ भी नही! तमन्ना की जतन किए पा लिया रहा क्या? कुछ भी नही! नैना मिले इश्क़ हुआ आँसू बहे मिला क्या ? कुछ भी नही! कोशिश की चूक गये नही मिला खोया क्या? कुछ भी नही! यादे है पछ्तावे हैं साँस रुकी बचा क्या? कुछ भी नही!

सुकून

इक सुबह इरादा किया, आज ज़रा सुकूं ढूँढ ही लेते हैं! अक्सर बस झलक दे जाता है. आज पता ही पूछ लेते हैं! वो रुख अख्तियार कर चले जिस ओर कम लोग बढ़ रहे थे इक धुंधली तस्वीर थी हर किसी के पास, जैसे बरसो पड़ी अलमारी से आज ही निकला हो!! हुजूम बढ़ता रहा, दिन ढलता रहा, रात के रखवाले ड्यूटी पर आ गए थे ! पाँव फैलाए हम तरु की जड़ में पड़ गए थे ! हँवा सखियों संग ज्यो ही खिल्किलाती सी गुज्ररी, किसी ने कंधे पर किसी ने हाँथ फेर दिया, चौक कर मुड़कर पूछ "कौन भाई शाब?" उफ़ जा चुके थे वो, फिर पता नहीं पूछ पाया !