आज फिर कोई टकरा गया मुझसे, फिर अपना नाम गम बता गया गर यकीं कर लूं उसका तोःकल जो मिला था , इसी सड़क पर , वो कौन था? शक्ल से तोः बेहतर था जरा , खुशियों का कोई सगा रहा होगा| पर हर दफा वही धोका कैसे खा जाता हूँ.. बहरूपिये वक़्त को पहचान नहीं पाता हूँ.. नजरो की खता है ना न कसूर मेरा है.. नजरिया है.. बदलता रहता है.....