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Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता, के किन अजीब रस्तों पे चले जा रहा हूँ, के कोई बुने जा रहा है , मैने सुने जा रहा हूँ, क्योंकि, जो तलाश है, वो मंज़िल नही, जो मंज़िल है वहाँ जाना नही, जो खो दिया है, उसे खोना ना था. जो हासिल  सा है, उसे पाना नही. आसमान की तरफ तो देखा होगा, कभी कभी आपको नही लगता, के बस ये जमी सरक रही है, आप रुके से हैं. Trade mill पे तो चला होगा, जो एक पाँव आगे निकल जाता है तो दूजा पीछे, और हम इसी एहसास से थक जाते हैं  की बड़ी दूर निकल आए. खैर मुझे यकीन हैं, आप भी बूझ गये होंगे, के ज़िंदगी भी    Keyser Söze   वाला खेल  है, पर रहने दीजिए, आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!

बेईमान शायर

पहली दो पंक्तियाँ श्रीमान सचिन तेंदुलकर को समर्पित करते हुए... देखा है लड़कपन को मैने ,रफ़्तारों से सौदा करते, [साभार youtube] देखी है आकुलता मैने ,चालिस की आँखों से झरते, देखी है दृढ़ता भावों मे, देखा है पौरुष का तांडव,  देखी है भागीरथ की क्षमता, देखा है अविचलित मानव, पर शीश झुकाए निकल पॅडू,  जब सीधी समतल  राहों पर, तुम मेरे शिथिल इरादों को, हिम्मत का ना वास्ता देना. मैं एक "बेईमान शायर" हूँ, मेरे ख़यालों को ना रास्ता देना. बड़ी पैनी नज़रों से मैने, ढूंढी जीवन की सार्थकता, कुछ  कम मादक सी लगी मुझे ,जाने क्यों  मधु की मादकता, मृग मरीचिका सी लगी मुझे खुशियों की हर एक खोज  प्रिय,  भौतिकतावादी  दलदल मे ,फँसती धँसती सी  सांसारिकता.  किंतु मन मेरा जो उड़ कर, वापिस जा बैठे नोटों पर, मेरी अपसारित चिंतन को , बुद्धा का ना वास्ता देना, मैं एक "बेईमान शायर" हूँ, मेरे ख़यालों को ना रास्ता देना. बड़ा रोचक लगता है मुझको लोगों के जीवन मे तकना, लोगों की पीड़, प्रयत्नो से अपने  अनुभव घट को भरना ...

A dedication to sachin's 175!!

तुम कहते थे तो यकीन नही होता था, कि हर कोई जुटा है हस्ती बचाने में! एक इन्सा कल खुदा होने चला तो खुदा इन्सा हो गया!!

सुकून

इक सुबह इरादा किया, आज ज़रा सुकूं ढूँढ ही लेते हैं! अक्सर बस झलक दे जाता है. आज पता ही पूछ लेते हैं! वो रुख अख्तियार कर चले जिस ओर कम लोग बढ़ रहे थे इक धुंधली तस्वीर थी हर किसी के पास, जैसे बरसो पड़ी अलमारी से आज ही निकला हो!! हुजूम बढ़ता रहा, दिन ढलता रहा, रात के रखवाले ड्यूटी पर आ गए थे ! पाँव फैलाए हम तरु की जड़ में पड़ गए थे ! हँवा सखियों संग ज्यो ही खिल्किलाती सी गुज्ररी, किसी ने कंधे पर किसी ने हाँथ फेर दिया, चौक कर मुड़कर पूछ "कौन भाई शाब?" उफ़ जा चुके थे वो, फिर पता नहीं पूछ पाया !

अब

वक़्त था जब ये जहाँ हमारा था अब तो सांस भी मांग कर लिया करते हैं वक़्त था जब इतराते थे अपने साये को देख कर भी अब तो आईने से भी मुह छुपा के चलते हैं वक़्त था जब मंजिलो तक पहुचने का हौसला था अब तो ठोकरों से ही टूट जाया करते हैं वक़्त था बेपरवाह ख्वाबो में जिया करते थे अब हकीकत से भी हम हँस के मिला करते हैं दरअसल उम्र बन जाते हैं कुछ लम्हे तजुर्बा बन जाते हैं कुछ फैसले बाजुए अब कर्म नही करना चाहती ये अब चेहरा छुपाने के काम आती हैं आहिस्ता आहिस्ता ही सही भ्रम टूट जाता है जिंदगी अपनी औकात पे आजाती है बस पहली कुछ दफा बाद दर्द होता है फिरजनाब आदत सी हो जाती है...