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बदलाव

Patratu Thermal Power Station

तुम्हारा ख़याल है  ,कुछ भी तोह नहीं बदला
वहीँ तोह खड़ा है वो सहतूत का पेड़
उन खट्टी शामों को शाखों  पे सजाये
ये रहा चापाकल के पास इंसानों का जत्था
कोक  से आज भी प्यास नहीं बुझती ना !
आज भी दिखाई देता है सड़क से
 मेरे घर की  खिड़की का पल्ला बाहे फैलाए
ये सड़क आज भी मिल जाती है उसी मैदान से
पहली बार जहाँ घुटने  छिले थे मेरे !

कुछ तोह बदला है लेकिन
झुक गया है जरा सा  सहतूत का पेड़,
शायद उम्र की बोझे के तले!
चापाकल  से  आखे अब  ऐसे देखती हैं ,
जैसे अजनबी हूँ इस राह क लिए!
घुन बसते  हैं  खिड़की क पल्लों में आजकल
पीपल की जड़े  भी तोह घुसपैठ कर रही है दीवारों से!
क़दमों को भी गुमान होता है अपनी ताकत पर
ठोकरों से भी  टूटने लगी है ये सड़क भी किनारों से!

दिल कहता है फिर
सब पहले सा  क्यों नहीं है?
मैं कहता हूँ ,बेटे!
सबकुछ वहीँ है बस  वही नहीं है!

Comments

  1. abe poem palle nahi parta hai :D
    par tera blogger theme jabardast hai :D

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  2. yaar ye hai un chhoti chhoti cheezon ke baare me jo aapke bachpan se aapse judi hain..aap inse itna closely observe karte hain ki waqt k saath jo jara bhi badla hai aapko dikhta hai..this is abt feeling those small thngs special which has been a part of ur lyf since long!

    ReplyDelete
  3. tmhare routine ko dekhkar kabhi nhi socha tha ki tm itna kuchh likhte ho sachhi !! wonderful :)

    bachpan k bitaye anjaani khushi ko aaj tm jitna feel karke khush n wo ab dubara naa ho pane ka gam ko bhut hi pyare andaaj me likhe ho :)
    specialy "चापाकल से आखे अब ऐसे देखती हैं ,
    जैसे अजनबी हूँ इस राह क लिए! was awesome realy !!

    ReplyDelete
  4. प्रकृति की माँग है ये बदलाव
    हर बुरे वक़्त की माँग है ये बदलाव
    फिर भी हम चाहते हैं सब पहले जैसा
    कैसी है ये चाहत ???????????????////

    ReplyDelete
  5. क़दमों को भी गुमान होता है अपनी ताकत पर
    ठोकरों से भी टूटने लगी है ये सड़क भी किनारों से!

    very thoughtful....nicely written...:)

    ReplyDelete
  6. thanxx rahul ! achha laga ki waqt diya tumne bere blog ko!
    @baba khan:well tried!
    @saumya:thanxx a lot for passing by!:)

    ReplyDelete
  7. Beautifully Written buddy...!!

    Special mention to d line:-

    ये सड़क आज भी मिल जाती है उसी मैदान से
    पहली बार जहाँ घुटने छिले थे मेरे !!

    Reminds soo much of d childhood dayss..!:))

    ReplyDelete
  8. And Ending iz too good..:-

    दिल कहता है फिर
    सब पहले सा क्यों नहीं है?
    मैं कहता हूँ ,बेटे!
    सबकुछ वहीँ है बस वही नहीं है!

    ReplyDelete
  9. Hmmm nothing is constant in da world..except da CHANGE itself..nice poem

    ReplyDelete
  10. Great expression of nostalgic longing ..
    Nostalgia is longing which can never be fulfilled and u expressed it through ur poem

    Dont know how many corners of my past were visited reading this poem ....
    And i saw some Rain at those corners
    It will take a while when it dries out .....

    ReplyDelete
    Replies
    1. @Chandan : It was just an attempt to capture some of my childhood days . Whenever i turn around and look into my past, i feel blessed to find some wonderful memories. These r few things u will always have but will never be able to relive ! these r special.!

      Thanks for ur insight n read! :)

      Delete
  11. hai kyun rooh wapas us poornima ko jaana chahti
    hai kyun rooh amawaas se yun ghabrati hai
    kudraat hi toh hai bahareen bas yun hi aati jaati hai
    mat ghabra e azeem ki tu bas maali hai
    khara reh wahin jahan tha abhi
    raasta teri ood murega bas agle hi waqt ke karwat pe

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
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