Skip to main content

Posts

Showing posts with the label meaningless

बीमार कुत्ता

वो बीमार कुत्ता  जो दरवाजे के पास, गोल गोल चक्कर लगाता था,  शून्य के इर्द-गिर्द! गिर जाता था, फिर होश संभाल कर, घूमने लगता था, उसे जाना नही था कहीं, बस यूँ  ही काट देनी थी, अपनी बची खुची ज़िन्दगी। आज किसी भीड़ मे जब , एक ख्वाब से, हाथ छुड़ा कर घर आया, तो बड़ी देर तक जेहन में,  वो कुत्ता, गोल गोल घूमता रहा ।

Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता, के किन अजीब रस्तों पे चले जा रहा हूँ, के कोई बुने जा रहा है , मैने सुने जा रहा हूँ, क्योंकि, जो तलाश है, वो मंज़िल नही, जो मंज़िल है वहाँ जाना नही, जो खो दिया है, उसे खोना ना था. जो हासिल  सा है, उसे पाना नही. आसमान की तरफ तो देखा होगा, कभी कभी आपको नही लगता, के बस ये जमी सरक रही है, आप रुके से हैं. Trade mill पे तो चला होगा, जो एक पाँव आगे निकल जाता है तो दूजा पीछे, और हम इसी एहसास से थक जाते हैं  की बड़ी दूर निकल आए. खैर मुझे यकीन हैं, आप भी बूझ गये होंगे, के ज़िंदगी भी    Keyser Söze   वाला खेल  है, पर रहने दीजिए, आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!

हासिए पर !

इश्क़ और सियासत मे एक समानता है, वो आपकी समझ-बूझ पर बट्टा लगा देती है   कुछ ऐसे की पता ही नही चलता की इस तरफ या उस तरफ.!  फ़र्क बस इतना है की इश्क़ मे ये अनायास होता है,और सियासत मे अक्सर तैयारी से. ऐसे ही हासिये पे अटके कई सारे हालत आपके समक्ष : मुड़ के देखा था उसने जाते जाते, खैर हम कह भी उनसे क्या पाते, उनकी आँखों मे डबडाबाते  हुए, कुछ सवाल से तो थे, पर सवाल नही.  घरूब-ए-आफताब [ढलता सूरज] देखा था, उनकी उंगलियों के पोरों से, तब से बगिया मे फूल उरहुल के,  थे तनिक लाल से , पर लाल नही. इक दफ़ा  इन्क़िलाब गाया था, सियासतदारों की तंग गलियों मे, थी आरजू की कुछ बदल डालूं, तरीके ज़रा  बवाल से थे, पर बवाल नही. जिनकी जेबें टटोल कर तुमने, रखा था हांसियों, पे सालों  तक, उनकी मुट्ठी मे वोट थे लेकिन, लगते भले कंगाल से थे, पर कंगाल नही. मेरा घर देख कर जो पूछे कभी , शहरवालों !  जो कोई हाल मेरा, उससे कहना कि ना वो फ़िक्र करे, हैं तनिक बेहाल से, पर बेहाल नही!

अनायास!

एक ख़याल, किसी टूटे पत्ते सा, चल पड़ा है, हवाओं के हिचकोलों संग, गुलाटियाँ ख़ाता हुआ, दिशाहीन ! बस खो जाने, कई सारे गिरे पत्तों मे, करके तय, आदि से अंत का फासला, देख जाने कितने मौसम, लक्ष्यहीन!  ज़मीं का ज़ोर है शायद, शायद फ़िज़ा की साज़िश, या फिर वक़्त का सितम एक और पत्ता टूटा है अभी,  अनायास!

कुछ भी नही!

आखें खुली ज़मान देखा रोए ,मुस्कुराए समझा क्या? कुछ भी नही! तमन्ना की जतन किए पा लिया रहा क्या? कुछ भी नही! नैना मिले इश्क़ हुआ आँसू बहे मिला क्या ? कुछ भी नही! कोशिश की चूक गये नही मिला खोया क्या? कुछ भी नही! यादे है पछ्तावे हैं साँस रुकी बचा क्या? कुछ भी नही!