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एक बेतुकी कविता




कभी गौर किया है 
पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे ,
जो जलता रहता है ,
गुमनामी मे अनवरत,
बेवजह!

या  दौड़े हो कभी,
दीवार की तरफ,
बस देखने को एक नन्ही सी चीटी !
एक छोटे से बच्चे की तरह,
बेपरवाह!

या फिर कभी  लिखी है कोई कविता,
जिसमे बस ख़याल बहते गये हो,
नदी की तरह !
और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर,
बेतुकी .


या कभी देखा है खुद को आईने मे,
गौर से ,
उतार कर अहम के  सारे मुखौटे,
और बड़बड़ाया  है कभी..
बेवकूफ़.


गर नही है आपका जवाब,
तो ऐसा करते है जनाब,
एक  बेवजह साँस की ठोकर पर,
लुढ़का देते हैं ज़िंदगी,
और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर,
कहाँ जाकर ठहेरती है ये,
हो सकता है,
इसे इसकी ज़मीं मिल जाए.
किनारो से ज़रा टूट कर ही सही,
और आपको मिल जाए शायद,
सुकून...
बेहिसाब!


Comments

  1. Commendable job especially the last Para

    beautiful and meaningless !

    Absolute as Tao!

    .............................
    The world was destroyed the day, we made societies !

    The TAO died when we first talked about MORALITY !

    The Humans died the day we created Humanity !

    The Great Poem died when we tried to control our thoughts!
    ............................................

    Gravity Always wins!!
    So why not let it have its moments in our life
    why so serious !

    ............................................

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    Replies
    1. Meaningless never sounded like compliment ever before. Those four lines by TAO tells it all. Thanks for the read! :)

      Delete
  2. या कभी देखा है खुद को आईने मे,
    गौर से ,
    उतार कर अहम के सारे मुखौटे,
    और बड़बड़ाया है कभी..
    बेवकूफ़ :yes ye kiya hai :)

    एक बेवजह साँस की ठोकर पर,
    लुढ़का देते हैं ज़िंदगी,
    और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर,
    कहाँ जाकर ठहेरती है ये...awesome thought...at times all you want is to go with flow and not as planned...dekha jaaye to betuki cheezon mein 'tuk' kyada hota hai :)

    bemisaal kavita :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. hmm..great..Ek yes to mila.Aur Koi betuki kavita nahi likhi? Anyways ..Bhaot bahot sukriya aane ke liye bhi aur sarahne ke liye bhi. :)

      Delete
  3. Kya baat hai Sahab!
    Bas saanso ko disha dikha di!

    we never know the results of the choices we make, but it all makes sense in the retrospect!

    bohot khoob! :-)

    ReplyDelete
    Replies
    1. Hehehe.. Dishaheen chalne ki pairwi ki gayi hai yahan, shaab ! Anyways , Even that is also a conscious decision. Darshan dene ke liye dhanyawaad bhai! :)

      Delete
  4. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद यहाँ आने के लिए और इन पंक्तियों को सराहने के लिए. :)

      Delete

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ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
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