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मेहरबानी

एक बात बताउ ,शाब! वो उस सड़क को छोड़ कर,  तीसरी गली हैं ना साहब! जो दोनो सिरे से खुलती है, उसमे चंद कदमो पर, एक बड़ी उँची सी इमारत है यादों की. और उसके ठीक सामने एक उंघता सा, एक कमरे का मकान, जिसके आगे एक अकल का कुत्ता बिठा रखा है. जो हांफता रहता है,  घूमता रहता है,  दरवाजे के इर्द गिर्द, और चौकश हो जाता है वो ज़रा सी भी आहट पर, अगली या पिछली गली में. खुद को शेर समझता है, साहब! दरअसल बड़ी हिफ़ाज़त से रखा है कमरे को, कागज के चंद टुकड़ो पे बिखरे, कुछ गीले मोती, और फर्श पर अशरफियों से बिखरे, कुछ  अहम के टुकड़े. कोने मे औंधे मूह पडा एक जोड़ी जूता, जिसपे आज भी किसी खूबसूरत राह ही मिट्टी लगी है, ज्यों की त्यों. और बिस्तर पे करवट लेकर लेटी रहती है, कुछ घंटों की आधी-आधी नींद. और साहब !मेमशाब  खड़ी रहती है, उन खिड़की की सलाखों के पीछे. घंटों तकती हुईं सामने वाली इमारत की छत पर, चहलकदमी सी करती किसी परछाई की ओर. उसे खाँसते सुना है कभी - कभी मैने, और कभी - कभी अकल वाला कुत्ता भी  ब...

बहाना

उस रात बस हवाएँ चली थी, बिना बारिस के, और रह गया था चाँद सूखा सूखा. वक़्त जैसे-तैसे सरक रहा था,  बड़ी मशक्कत से, हौले हौले , केंचुए सा! बड़ी देर तक  देखता रहा मैं, अपने ख़यालों की छत से, बूँद बूँद टपकते अंधेरे, और वो  बेज़ार सा ,बिखरा हुआ मोम जो शायद सह नही पाया था, लौ की तपिश ! और वो बैठी रही बेफ़िक्र.. मेरे सिरहाने, के जैसे कोई जल्दी ना हो, और मालूम हो जिसे के जो छू दिया मुझको तो तब्दील हो जाऊँगा रेत के ढेर में! पर याद है उस रोज़, अभी वक़्त था भोर होने में, आसमान ज़रा साफ हो चला था, और ज्यों ही हाथ बढ़ाया था मैने उसकी ओर, तो एक ख़याल सा टकराया था. की  क्या जवाब दूँगा उसे, जो  जो कभी मिलेगा मुझे, के जिसने ज़िक्र किया था मेरा और मैं आ पहुचा था, और  यकीन था उसे कि बड़ी लंबी उमर है मेरी. उस रोज़ कहा था मैने के,ऐ ख़ुदकुशी! साँस लेना भी अजीब आदत है, जाते जाते ही जाती है. तू आज फिर लौट जा खाली हाथ, जीने का एक बहाना , अभी और बाकी है.

मुनासिब ?

जब भी दिल का कहा सुना हमने , था मुनासिब कहाँ सुना हमने. अजब से शौक पालता है ये दिल, कत्ल भी शौक से किया हमने. इसका किस्मत से दोस्ताना था, अपना दुश्मन तो वो पुराना था, इल्म बिल्कुल था हार जाने का, फिर भी ये दाँव ले लिया हमने. जिनको ताउम्र थे हम ढूंढुते रहे, वो एक दफ़ा जो मिले गये भी तो क्या? इसको तो उनसे भी कुछ शिकायत थी, उनसे भी मुह फुला लिया हमने. भोर आती थी मेरे दरवाजे, बड़ी मायूष लौट जाती थी, शाम हम जागते थे ये कहते, या खुदा! बहुत सो लिया हमने. एक जंग थी मेरी मुझसे, एक को तो हार जाना था, अपना हम और क्या बुरा करते, साहब ! इश्क़ कर लिया हमने. बड़े सारे पड़ाव देख लिए, तजुरबों की है फेहरिस्त बड़ी, अब तो खुद मे समा ले ऐ मौला, है बहुत जी लिया हमने. जब भी दिल का कहा सुना हमने, था मुनासिब कहाँ सुना हमने...