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कुछ भी नही!



आखें खुली
ज़मान देखा
रोए ,मुस्कुराए
समझा क्या?
कुछ भी नही!


तमन्ना की
जतन किए
पा लिया
रहा क्या?
कुछ भी नही!

नैना मिले
इश्क़ हुआ
आँसू बहे
मिला क्या ?
कुछ भी नही!


कोशिश की
चूक गये
नही मिला
खोया क्या?
कुछ भी नही!

यादे है
पछ्तावे हैं
साँस रुकी
बचा क्या?
कुछ भी नही!

Comments

  1. Kuch bhi toh nahi
    Tune apne adhron se chua tha
    hua tha kya
    Kuch bhi toh nahi
    Hum toh yun hi ro pade then
    Hua tha kya kuch bhi toh nahi
    teri kurti ke kuch button khule the
    Maine kuch kaha tha kya
    Kuch bhi toh nahi
    Bistar pe garam silwaten padi thin
    Tu yahin thi kya
    Kahin bhi nahi
    Kuch bhi nahin
    Hua tha kya kuch bhi toh nahi

    ReplyDelete
  2. Bhaot khoob ! In panktiyon ko thori aur aur ijjat mile toh inka bhi insaniyat pe bharsa bana rahega. Collection banaiye in sabka.:)

    ReplyDelete
  3. palle nahi padi teri yeh baat ..beabroo kar gayin yeh pantiyan ya rooh e gulzaar kar gayi yeh pantiyaan..?
    tu hi bata ae khuda jo tune kaabe se parda uthaya ho yun kafir mano sanam ka deedar hona ho

    ReplyDelete
    Replies
    1. ha ha..darasal, hamare kehne ka matlab tha ki in panktiyon ko thori ijjat bakhsiye aur inko jama kijye kahin kisi blog pe..taaki aur logon tak bhi pahuche.

      Delete

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
अब आसमान बादलों के ख्वाब देखने लगा था  और पहाड़ बर्फ की चादरों के,  जंगल पेड़ो के ख्वाब देखने लगे और  कदम वीरानो  के। और वो मछली.. वो मछली..  प्लास्टिक के ढेर मे घिर चुकी थी, बमुश्किल शांस ले पा रही थी,  …

सड़क के उस पार

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'मेडम' आवाज़ लगाई एक ऑटो वाले ने, वो मुड़ी और मै  भी.
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कुचलती हुई निकल गयी एक कार.
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सड़क पार करते-करते मैने खुद को बड़ा होते देखा !