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हेडलाइट

तनहा स्याह राहो में , अक्सर  ऑन कर लेता हूँ, और चलता चला जाता हूँ। कभी कभी उजालों में , बेजरूरत भी, आन रह जाती हो तुम। यु ही कोई देख लेता है, और टोंक देता है , ऑफ कर लेता हूँ झटके से। मेरे बाइक की हेडलाइट, और तेरी खुसनुमा यादें, कित्ती मिलती जुलती हैं न।

बीमार कुत्ता

वो बीमार कुत्ता  जो दरवाजे के पास, गोल गोल चक्कर लगाता था,  शून्य के इर्द-गिर्द! गिर जाता था, फिर होश संभाल कर, घूमने लगता था, उसे जाना नही था कहीं, बस यूँ  ही काट देनी थी, अपनी बची खुची ज़िन्दगी। आज किसी भीड़ मे जब , एक ख्वाब से, हाथ छुड़ा कर घर आया, तो बड़ी देर तक जेहन में,  वो कुत्ता, गोल गोल घूमता रहा ।

सोचता हूँ मैं..

कई बार मैं आसमान की तरफ देखता हूँ और कुछ नही सोचता, कई बार मैं चाँद को सोचता हूँ आखें बंद करके, कई बार जब तुम्हे सोचता हूँ, तो तुम्हे  देखने लगता हूँ! और जब देखता हूँ तुम्हे , तो सोचने लगता हूँ कि  देखा जाए तो  बहोत ज़्यादा फ़र्क नही है देखने और सोचने मे, देखने का तरीका है, जी बस! कि जो देखते हैं , उसे सोच लेते हैं, और जो सोचते हैं , उसे देख लेते हैं! उतना ही सोच पाते हैं ,जितना देख पाते हैं और उतना ही देख पाते हैं, जितना सोच पाते हैं! बनाने वाले ने फिर  क्या सोच कर आँख और अकल  अलग अलग बनाई होगी? देखा जाए तो, इतते बड़े आसमान के नीचे इतनी बड़ी  है दुनिया, और कितना कम है जो हम देख पाते हैं या सोच पाते हैं सोचता हूँ मैं कभी कभी,  के देखने और सोचने का ये जो सिलसिला नही होता, जो यकीन नही होता अपनी आखों पर इतना, और अपने सोचने पे इतना गुमान नही होता , तो क्या कुछ और देख पता मैं, तो क्या कुछ और सोच पाता मैं! के फिर आसमान देख कर,  पता नही क्या सोचता? और चाँद सोचने की...

Spoilers Ahead

कभी कभी आपको नही लगता, के किन अजीब रस्तों पे चले जा रहा हूँ, के कोई बुने जा रहा है , मैने सुने जा रहा हूँ, क्योंकि, जो तलाश है, वो मंज़िल नही, जो मंज़िल है वहाँ जाना नही, जो खो दिया है, उसे खोना ना था. जो हासिल  सा है, उसे पाना नही. आसमान की तरफ तो देखा होगा, कभी कभी आपको नही लगता, के बस ये जमी सरक रही है, आप रुके से हैं. Trade mill पे तो चला होगा, जो एक पाँव आगे निकल जाता है तो दूजा पीछे, और हम इसी एहसास से थक जाते हैं  की बड़ी दूर निकल आए. खैर मुझे यकीन हैं, आप भी बूझ गये होंगे, के ज़िंदगी भी    Keyser Söze   वाला खेल  है, पर रहने दीजिए, आप Climax का इंतज़ार कर लीजै!

१० % एक्सट्रा

ये तुम्हारे साथ भी हुआ होगा, कि जेब टटोली होगी  तुमने पैंट धोने से पहले, और मुरझाया सा इक नोट मिला होगा. शायद भूल गये थे तुम इसे, जेब मे रखकर महीनो पहले. ये  भी कभी हुआ होगा कि राशन दुकान वाले चाचा ने,  पकड़ाई होगी Parle G की पैकेट तुम्हारे नन्हे हाथों मे, तो कुछ बड़ा मालूम पड़ा होगा, शायद बेख़बर होगे तुम "१० % एक्सट्रा" वाले ऑफर से. मुमकिन है के ये  भी हुआ हो, की किसी शाम जो बढ़े होगे  तुम, किसी व्यस्त सिग्नल की तरफ, दिल को दिलासा देते कि बस यही एक एब तो  है इस हसीन शहर में. तुझे देख कर ही, हरी हो गयी हो लाल सिग्नल. पर ये रोज़ रोज़ तो नही  होता होगा, और ना तुम मायूष होते होगे, के आख़िर आज क्यों ना हुआ ये.  जो  इत्ता स्याना है तू, तो बस इत्ता बता दे ए दिल, कि आज जो ज़रा तन्हा है तू, तो इतना परेशा क्यों है? आख़िर समझ क्यों नही पाता , कि १० % एक्सट्रा वाले ऑफर  रोज़ रोज़ नही होते.

आरजू

एक सड़क हो लंबी सीधी सी, और दोनों ओर वीराने हो, कुछ चेहरे हो अंजाने से, और भूले-बिसरे गाने हो. एक शाम हो कुछ ऐसी लंबी , के ना तिमिर थके , ना मिहिर थके, एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !! कुछ दूर चलूं तो दूर कहीं, एक झोपड़ हो सूना सूना, छत से लटकी हो लालटेन, खामोश सा हो कोना कोना, ना पास हो कुछ बेशक़ लेकिन, एक आस रहे , विश्वास रहे. एक ऐसे सफ़र की आरजू है  हमें !! हो भीगी-भीगी सी सड़के , कुछ बूंदे बस संवादी हो, कुछ यादें बासी-बासी हों, खो जाने की आज़ादी हो. कुछ ख्वाहिश हो मद्धम-मद्धम, एक प्यास रहे, आभास रहे. एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !! एक विहग दिखे ऐसे नभ मे, मानो फिरता मारा-मारा, मेरी तरह पथ भूला सा, मेरी तरह कुछ आवारा!! इतनी शक्ति हो पंखों मे, के ना चाह थामे , ना राह थामे, एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें!!

आम का पेड़

लोग कहते हैं कि, इसे लगाया नही था . यूँ ही फेंक दी थी गुठली, किसी ने चूस कर, और ये पनप आया था. पर मैने इसे हमेशा, बड़ा ही देखा है, बुजुर्ग सा , विशाल से तने वाला, और तने से दुविधा के मानिंद , निकली हुई  दो शाखे. उनमे  एक थी जो, आसमान छूने निकली थी, और उसपर मौसम  रंग बदलते दिखते थे, कोई मौसम उसपर मंज़रों पे, हरा रंग मल जाता था , तो कभी गुच्छों मे  लटके हुए फल दिख जाते थे, प्रदर्शनकारियों से लाल पीले. पर जो दूसरी साख  थी, उसका रुख़ ज़मीन की तरफ था, झुका हुआ था वो ज़रा, जिसपर मंज़र तो आते थे, पर चर लिए जाते थे, या फिर शिकार हो जाते थे, गुज़रने वालों के उतावलेपन का. और यही सवाल था, कि आख़िरकार   एक सी ज़मीन और, एक सी आबो हवा मे, ये कैसा बटवारा है, के किसी के हिस्से हैं तल्खियाँ  तो किसी को नाज़ों से सवाराँ है! खैर वो सवाल वक़्त से साथ, बढ़ता चला गया, वो आम का पेड़ अब बढ़कर , मेरे मुल्क जितना बड़ा हो गया है, और आज भी मैं हैरानी से यही सोचता हूँ , पत्तो...