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आरजू


एक सड़क हो लंबी सीधी सी,
और दोनों ओर वीराने हो,
कुछ चेहरे हो अंजाने से,
और भूले-बिसरे गाने हो.
एक शाम हो कुछ ऐसी लंबी ,
के ना तिमिर थके , ना मिहिर थके,
एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !!


कुछ दूर चलूं तो दूर कहीं,
एक झोपड़ हो सूना सूना,
छत से लटकी हो लालटेन,
खामोश सा हो कोना कोना,
ना पास हो कुछ बेशक़ लेकिन,
एक आस रहे , विश्वास रहे.
एक ऐसे सफ़र की आरजू है  हमें !!




हो भीगी-भीगी सी सड़के ,
कुछ बूंदे बस संवादी हो,
कुछ यादें बासी-बासी हों,
खो जाने की आज़ादी हो.
कुछ ख्वाहिश हो मद्धम-मद्धम,
एक प्यास रहे, आभास रहे.
एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !!


एक विहग दिखे ऐसे नभ मे,
मानो फिरता मारा-मारा,
मेरी तरह पथ भूला सा,
मेरी तरह कुछ आवारा!!
इतनी शक्ति हो पंखों मे,
के ना चाह थामे , ना राह थामे,
एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें!!

Comments

  1. बहुत कुछ कह गए हैं आप इन अलफ़ाज़ो में।

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  2. Hi Amit, wanted to read this 'fursat se'. So waited for Sunday.
    Good to see you going to the depths and subtleties of understanding at such young age. These lines have invoked a personal discourse within me. I will reserve that for a tête-à-tête with you sometime.
    Thanks and best wishes.

    ReplyDelete
  3. बहुत खूब .. इस आरज़ू के सदके ... काश उड़ान जारी रहे ...

    ReplyDelete
  4. कुछ यादें बासी-बासी हों,
    खो जाने की आज़ादी हो.

    Loved these lines a lot :)

    ReplyDelete

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
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सड़क के उस पार

वो सड़क पार कर रही थी, मैं भी. उसने सड़क का मुआयना किया,मैने भी! वो तेज़ी से आगे बढ़ी, मैं भी. वो सड़क के उस पार थी , मैं भी!
'मेडम' आवाज़ लगाई एक ऑटो वाले ने, वो मुड़ी और मै  भी.
उसके बैग से गिरी एक चीज़
कुचलती हुई निकल गयी एक कार.
और फिर ,और बड़े तिरस्कार से बड़बड़ाई ओह ! पेन. उसे ज़रा भी अफ़सोस नही था, और मुझे.. था ,बस इसी बात का.' कि था एक जमाना के जब पेन मे रीफिल बदली जाती थी, और एहसास चिट्ठियों मे लिखे जाते थे! लिखावट को तवज़्ज़ो देते थे लोग प्रिंट आउट नही होता था तब. खबरों केलिए
कल की अख़बार का इंतज़ार होता था कॉँमेंट्री रेडियो पर भी सुनी जाती थी और सचिन ओपन करने आता था इश्क़ बस फ़िल्मो मे होता था असल ज़िंदगी मे तो  बस  चक्कर. आवारगी भी  खूब होता थी और पिटाई भी होती थी जमकर. तब  फ़िल्मो मे हीरो दौड़ते दौड़ते  बड़े हो जाते थे. और आज़ ..
सड़क पार करते-करते मैने खुद को बड़ा होते देखा !