Skip to main content

१० % एक्सट्रा

ये तुम्हारे साथ भी हुआ होगा,
कि जेब टटोली होगी  तुमने
पैंट धोने से पहले,
और मुरझाया सा इक नोट मिला होगा.
शायद भूल गये थे तुम इसे,
जेब मे रखकर महीनो पहले.

ये  भी कभी हुआ होगा
कि राशन दुकान वाले चाचा ने,
 पकड़ाई होगी Parle G की पैकेट
तुम्हारे नन्हे हाथों मे,
तो कुछ बड़ा मालूम पड़ा होगा,
शायद बेख़बर होगे तुम
"१० % एक्सट्रा" वाले ऑफर से.



मुमकिन है के ये  भी हुआ हो,
की किसी शाम जो बढ़े होगे  तुम,
किसी व्यस्त सिग्नल की तरफ,
दिल को दिलासा देते कि
बस यही एक एब तो 
है इस हसीन शहर में.
तुझे देख कर ही,
हरी हो गयी हो लाल सिग्नल.

पर ये रोज़ रोज़ तो नही  होता होगा,
और ना तुम मायूष होते होगे,
के आख़िर आज क्यों ना हुआ ये. 
जो  इत्ता स्याना है तू,
तो बस इत्ता बता दे ए दिल,
कि आज जो ज़रा तन्हा है तू,
तो इतना परेशा क्यों है?
आख़िर समझ क्यों नही पाता ,
कि १० % एक्सट्रा वाले ऑफर 
रोज़ रोज़ नही होते.

Comments

  1. Nice man..! :) Roj roj thodi hota hai 10% extra..! loved it.. :)

    ReplyDelete
  2. क्या बात है ... यस ऑफर सच में रोज़ नै आते ..

    ReplyDelete
  3. बस यही एक एब तो
    है इस हसीन शहर में.
    तुझे देख कर ही,
    हरी हो गयी हो लाल सिग्नल.

    - Humor at it's best! Good Amit. Rejuvenating stuff!

    ReplyDelete
  4. kya baat! kya baat! zindagi k har sawaal ka asan sa jawab. No bhari bharkam word required... :)

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
अब आसमान बादलों के ख्वाब देखने लगा था  और पहाड़ बर्फ की चादरों के,  जंगल पेड़ो के ख्वाब देखने लगे और  कदम वीरानो  के। और वो मछली.. वो मछली..  प्लास्टिक के ढेर मे घिर चुकी थी, बमुश्किल शांस ले पा रही थी,  …

सड़क के उस पार

वो सड़क पार कर रही थी, मैं भी. उसने सड़क का मुआयना किया,मैने भी! वो तेज़ी से आगे बढ़ी, मैं भी. वो सड़क के उस पार थी , मैं भी!
'मेडम' आवाज़ लगाई एक ऑटो वाले ने, वो मुड़ी और मै  भी.
उसके बैग से गिरी एक चीज़
कुचलती हुई निकल गयी एक कार.
और फिर ,और बड़े तिरस्कार से बड़बड़ाई ओह ! पेन. उसे ज़रा भी अफ़सोस नही था, और मुझे.. था ,बस इसी बात का.' कि था एक जमाना के जब पेन मे रीफिल बदली जाती थी, और एहसास चिट्ठियों मे लिखे जाते थे! लिखावट को तवज़्ज़ो देते थे लोग प्रिंट आउट नही होता था तब. खबरों केलिए
कल की अख़बार का इंतज़ार होता था कॉँमेंट्री रेडियो पर भी सुनी जाती थी और सचिन ओपन करने आता था इश्क़ बस फ़िल्मो मे होता था असल ज़िंदगी मे तो  बस  चक्कर. आवारगी भी  खूब होता थी और पिटाई भी होती थी जमकर. तब  फ़िल्मो मे हीरो दौड़ते दौड़ते  बड़े हो जाते थे. और आज़ ..
सड़क पार करते-करते मैने खुद को बड़ा होते देखा !