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अधूरी रहने दो.

मेले से किसी  मुट्ठी मे बंद 
लौट आए सिक्के की तरह,
या ताश के खेल में आख़िर तक,
नाकाम किसी इक्के की तरह,
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.


वहाँ जहाँ बस उड़ाने बात करती है,
उस वीरान मकान की तरह,
और जिसके कई लफ्ज़ उर्दू से लगते हो,
ऐसी किसी ज़बान की तरह.
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

भरी बरसात मे सूखे रह गये
 छत के  उस कोने की तरह,
या बरसो चली k बंद घड़ी मे 
आख़िर मे बजे पौने की तरह.
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

एक मासूम कलम से टेढ़ी-मेडी
खीची किसी लकीर की तरह,
या किसी चबूतरे पे औंधे मुह लेटे
उस अधमरे फकीर की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.


आधे चाँद को सीने से लगाए 
उंघते, उस आसमान की तरह !
और हां वो कभी कभी ठीक लिख लेता है,
ऐसी किसी पहचान की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.

वहां जहाँ  तुम और मैं अक्सर बिछड़ जाते है
ऐसे किसी जहान की तरह,
और उम्मीद की ड्योढ़ी से अब तक झाकते
किसी दिल-ए-नादान की तरह
एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो.



Comments

  1. क्या खूब लिखा... खैर रहने दो!

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  2. मेले से किसी मुट्ठी मे बंद..लौट आए सिक्के की तरह..waahh
    Loved the analogy and the thought :)

    ReplyDelete
  3. Woh labjo ki kami se,
    Vyakt na hui ek ehsaas ki tarah..

    Woh shabdon ki kami se,
    Adhuri reh gayi kavita ki tarah..

    एक ख्वाहिश अधूरी रहने दो ||


    ___________________________

    Cha Gye bhai.. ekdum badiya.. :)

    ReplyDelete
  4. ख्वाइशें तो बहुत हैं, पर उम्मीद मुठ्ठी भर ही हैं...
    खेर रहने दो... :D

    ReplyDelete
    Replies
    1. Jara si bachi khuchi ummid ki kaafi hoti hai bhai, khair kisi aur din, rehne do. Padhne k liye shukria! :)

      Delete
  5. वो रोज अपनी कल्पना में जिसे ढूढ़ा करता है
    उस शायर के अरमान की तरह
    एक ख्वाईश अधुरी रहने दो॥

    ReplyDelete

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
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