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बग़ावत




मैं वो कहाँ लिखता हूँ जो मैं लिखना चाहता हूँ,
मैं वो भी नही लिखता जो आप पढ़ना चाहते हैं,
हमारे दरम्यान जो बिखरे पड़े हैं,
वो तो कुछ लफ्ज़ हैं जो बग़ावत कर बैठे हैं.

गर मान लें इनकी तो मेरी रूह का विस्तार, 
इनकी उड़ान के लिए शायद छोटा पड़ जाता  है,
या शायद मेरे मन के अंधेरों में ,
बढ़ जाता है इनकी गुमशुदगी का एहसास.

इन्हे लगता है कि बरसो से मैने बस कुचला है  इन्हे.
कभी वक़्त ने नाम पर, कभी हालात का हवाला देकर !
नादान हैं, नही मालूम इनको गर्दिशे जमाने की,
के धूल की परतों तले, गुज़र जाती है ज़िंदगानी भी.

अंजान , के कितने महफूज़ थे ये मेरे ख़यालों मे.
इन्हे अक्सर लगता था कि मैं कोई तानाशाह हूँ,
मेरे लफ्ज़ तू विदा ले,और हिन्दुस्तान देख आ,
लोकशाही के हालत भी कुछ  ज़्यादा  अच्छे नहीं है! 



P.S. : I  am a firm believer in the idea called democracy and India. The last few  lines are inspired from the current state of affairs in our country . This is how i show my solidarity with Mr. Aseem Trivedi.You are a hero,Sir! I wish the good sense to prevail among our administrators, ASAP.

Comments

  1. अब जब समाज के ठेकेदारों ने सोच ही लिया है की इस देश को कहीं का नही छोड़ेंगे तो फिर जनता को, क्यूँ झूठा लोकतंत्र का दिलासा देती रहती है?

    यह सरकार कोई सद्दाम और गद्दाफ़ी से कम है? कम से कम उनके लोगों को पता तो था की वो निरंकुश्ता के अधीन हैं.

    एसी परिस्थितियों मे एक कमज़ोर आम आदमी बस यही कल्पना कर सकता है की किसी दिन कोई डार्क-नाइट उठेगा और बस वो इसी उम्मीद मे अपना सारा जीवन गुज़ार देगा|

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    1. सरकार ग़लत हो सकती है किंतु लोकशाही का कोई और विकल्प नही. आवश्यकता इस बात की है की हम अगली दफ़ा अपने वोट का इस्तेमाल ज़्यादा समझदारी से करे. और हाँ! डार्क नाइट तो आ चुका है,असीम त्रिवेदी, केजरीवाल ! उनका साथ दे दे बस, लड़ाई कठिन ज़रूर होगी किंतु जीत सुनिश्चित है!
      धन्यवाद पढ़ने के लिए और अपने विचार रखने के लिए! :)

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  2. गर मान लें इनकी तो मेरी रूह का विस्तार,
    इनकी उड़ान के लिए शायद छोटा पड़ जाता है,
    ahaa...kya baat kahi hai!!

    नादान हैं, नही मालूम इनको गर्दिशे जमाने की,
    के धूल की परतों तले, गुज़र जाती है ज़िंदगानी भी.
    too good!!

    मेरे लफ्ज़ तू विदा ले,और हिन्दुस्तान देख आ,
    लोकशाही के हालत भी कुछ ज़्यादा अच्छे नहीं है!
    lokshahi word sunkar ab to sirf hansi hi aati hai...parliament mein nautankiyaan hoti hain...jinhe jail mein hona chahiye wo bahar hain...jo kuch accha karte hain wo jail bhej diye jaate hain...however RESPECT for KEJRIWAL, TRIVEDI N OTHER MEMBERS OF IAC.....we need more of them!!

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    1. Thanks a lot , Soumya !

      Bilkul , Parliament ko mazaak bana dia gaya hai.Halat achhe nahi hain.Lekin IAC movement ki sabse badi kamyabi ye hai ki unhone ek aas jaga di hia logon me. Log charcha kar rahe hain, jag rahe hain! Aur main ashanwit hoon ki bhawishya sunehra hai! :)

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  3. शब्द, कलम कूची .. कुछ भी बगावत करे ... आज का तंत्र उसे जबरन दबा देगा ...
    इस मशाल को लंबा जलने की जरूरत है ...

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    1. Bilkul..Hamari bhi yahi khwahish hai aur koshish bhi! Padhne ke liye shukriya! :)

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  4. Rebellion is the first characteristic of true intellect !!


    अपने ख्यालों को लफ्जों से जोड़ दो
    शायद रूह को भी जगह मिले

    और ज़माने की गर्दिशों की परवाह किसे ....
    कुछ अपनी ही बनायीं रेत के घरौंदों में दब कर रह जाते हैं

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    1. Bilkul gurudev..gaur farmane layak baat ki hai.padhne ke liye dhanyawaad! :)

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  5. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..!!

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    Replies
    1. Padhne aur sarahne ke liye bahut bahut dhanyawaad! Aaate rehiye! :)

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  6. Very nice Amit... Good to see the junoon in your blood.

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
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'मेडम' आवाज़ लगाई एक ऑटो वाले ने, वो मुड़ी और मै  भी.
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