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सुक्रगुज़ार


ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,
पैरो से हमारे टकरा जाती कोई अजनबी लहर,
और आसमान मे हौले से चाँद निकल आता!
ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता !

ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,

अक्सर हमारे चाय की प्यालियाँ ट्रे मे टकरा जाया  करती
और मेरे अख़बार के चंद पन्ने उसकी हाथो मे होते!
ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता !

ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,

उसकी आखों से छलक पड़ते दो आह्लाद क आँसू,

मेरी जेब से निकले  चंद सिक्के अनमोल हो जाते!
ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता!

ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,
तेरे इम्तिहान मे हमारे लिए सवाल एक से होते,
और मैं उसकी नकल करके पास हो जाता!
ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता!

ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,

उसकी दुआओं मे कहीं हमारा भी नाम होता
और शायद, मेरे  पास माँगने को कुछ भी नही..
ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता!!

Comments

  1. Touching & intriguing! but didnt get the connection! :|

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  2. Loved itt Amit..!!:)

    तेरे इम्तिहान मे हमारे लिए सवाल एक से होते,
    और मैं उसकी नकल करके पास हो जाता!

    Above line is Soo true...!!
    Keep up the gud work..:)

    ReplyDelete
  3. @kishu..abe bhai it was dedicated to u, i never said its ur story. Thanx btw.

    @mishra...thanx man..cusat me chaar saal padhne k baad paas hone k alawa kuch nahi sujhta.

    ReplyDelete
  4. ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर,
    अक्सर हमारे चाय की प्यालियाँ ट्रे मे टकरा जाया करती
    और मेरे अख़बार के चंद पन्ने उसकी हाथो मे होते!


    very sweet.....bohot khoobsurat nazm hai....awesome




    i somehow thought i'd already commented on this one though.....chhaddo :)

    ReplyDelete
  5. @saanjh...thank u so much...n yess feel free to comment any number of tyms, though it was just d frst one. :)

    ReplyDelete
  6. पहले सोचा की बेहतरीन पंक्तियाँ चुन के तारीफ करून ... मगर पूरी नज़्म ही शानदार है ...आपने लफ्ज़ दिए है अपने एहसास को ... दिल छु लेने वाली रचना ...

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    Replies
    1. bahut bahut shukriya sanjay shaab! Aaplog padhte hain toh likhne me maja aata hai! :)

      Delete

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

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उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
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