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कल की तलाश




कल को कल देखेंगे ,
चलो आज को निपटाते हैं,
वक़्त के इरादों को कहाँ देखा है हमने ,
चलो इस पल में ही जी जाते हैं...

कल जो आज के लिए सोचा था हमने,
आज वो हम बिलकुल नहीं हैं ..
फिर कल के लिए सपने संजोते ,
आज बिताना कितना सही है??

आज जो मिठास है इन खवाबो में,
कल करवाहट बन जायेगी ..
ये मजे देती अनकही ख्वाहिशे ,
कल अतीत की टीस बन जायेगी ..

फिर क्यों इन लम्हों की जवानी को
उस कल पर कुर्बान करते हैं ,
जो "कल " अपनी ही जुबां से ,
अपनी बेवफाई का एलान करते हैं ...

Comments

  1. bahut achchhi kavitayen hain........
    per ek baat yaad rakhana aisi kavita shadi k baad mat likhana warna grihyuddh hone ki sambhawana bani rahegi.really it was very very good.

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  2. rightly said yaar, all we have is our present, past is past and no one knows the future !

    जो "कल " अपनी ही जुबां से ,
    अपनी बेवफाई का एलान करते हैं ...

    bahut sahi !! future bilkul us bewafa premi ki tarah hai, jiske baare mein hum kabhi nishchint nai rah sakte, uske dhokhe se bach nai sakte, pata nai kaun sa kal hamari zindagi ko nark bana jaaye.

    lets enjoy and live in the present !

    cheers !

    ReplyDelete
  3. u have improved so much in poem writing i am soooo impressed to see. it is not that i have not known this art of yours earlier but these poems have shear class. really u write very good.....keep going....best of luck!!!!

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एक बेतुकी कविता

कभी गौर किया है  पार्क मे खड़े उस लैंप पोस्ट पे , जो जलता रहता है , गुमनामी मे अनवरत, बेवजह!
या  दौड़े हो कभी, दीवार की तरफ, बस देखने को एक नन्ही सी चीटी ! एक छोटे से बच्चे की तरह, बेपरवाह!
या फिर कभी  लिखी है कोई कविता, जिसमे बस ख़याल बहते गये हो, नदी की तरह ! और नकार दिया हो जिसे जग ने  कह कर, बेतुकी .

या कभी देखा है खुद को आईने मे, गौर से , उतार कर अहम के  सारे मुखौटे, और बड़बड़ाया  है कभी.. बेवकूफ़.

गर नही है आपका जवाब, तो ऐसा करते है जनाब, एक  बेवजह साँस की ठोकर पर, लुढ़का देते हैं ज़िंदगी, और देखते हैं की वक़्त की ढलानों पर, कहाँ जाकर ठहेरती है ये, हो सकता है, इसे इसकी ज़मीं मिल जाए. किनारो से ज़रा टूट कर ही सही, और आपको मिल जाए शायद, सुकून... बेहिसाब!


ख्वाबों वाली मछली

किसी ने देखा होगा ख्वाब समुन्दरो का,आसमानो का, और समुंदर मे तैरते आसमान के अक्स का. समुंडरों ने देखा होगा बर्फ़ाब पहाड़ों का ख्वाब ,  सफेदी सी लिपटी बर्फ की चादरों का,और एक छोटीसी मनचली मछली का.
उस मछली ने देखा होगा ,  ज़मीन का ख़्वाब. फिर किसी रेंगते ख्वाब ने कोई झुका हुआ सा ख्वाब,  किसी सीधे खड़े ख्वाब ने  कदमो का ! उस कदम ने अपने  मे साथ चलते हमकदम का ख्वाब देखा होगा  और फिर ... और फिर .. फिर दोनो ने मिलकर कई सारे ख्वाब.
ख्वाब जैसे उँचा मकान , पहाड़ के उस पार जाती सड़क. किताबे, बस्तियाँ, शराब, महताब. और फिर, ख्वाबों का एक रेला चल पड़ा होगा, कुछ पहाड़ के इस पार रह गये होंगे, कुछ पहाड़ के उस पार. पर अब धीरे धीरे सब अलग अलग ख्वाब देखने लगे, कुछ दौलत का ख्वाब ,कुछ ताक़त का ख़्वाब. कुछ दर्द का ख्वाब , कुछ राहत का! कोई रोटी का, कोई शराब का, कुछ नीन्द के मारे देखने लग गये ख्वाब ख्वाब का.
अब आसमान बादलों के ख्वाब देखने लगा था  और पहाड़ बर्फ की चादरों के,  जंगल पेड़ो के ख्वाब देखने लगे और  कदम वीरानो  के। और वो मछली.. वो मछली..  प्लास्टिक के ढेर मे घिर चुकी थी, बमुश्किल शांस ले पा रही थी,  …

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'मेडम' आवाज़ लगाई एक ऑटो वाले ने, वो मुड़ी और मै  भी.
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कुचलती हुई निकल गयी एक कार.
और फिर ,और बड़े तिरस्कार से बड़बड़ाई ओह ! पेन. उसे ज़रा भी अफ़सोस नही था, और मुझे.. था ,बस इसी बात का.' कि था एक जमाना के जब पेन मे रीफिल बदली जाती थी, और एहसास चिट्ठियों मे लिखे जाते थे! लिखावट को तवज़्ज़ो देते थे लोग प्रिंट आउट नही होता था तब. खबरों केलिए
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सड़क पार करते-करते मैने खुद को बड़ा होते देखा !