Skip to main content

Posts

अनायास!

एक ख़याल, किसी टूटे पत्ते सा, चल पड़ा है, हवाओं के हिचकोलों संग, गुलाटियाँ ख़ाता हुआ, दिशाहीन ! बस खो जाने, कई सारे गिरे पत्तों मे, करके तय, आदि से अंत का फासला, देख जाने कितने मौसम, लक्ष्यहीन!  ज़मीं का ज़ोर है शायद, शायद फ़िज़ा की साज़िश, या फिर वक़्त का सितम एक और पत्ता टूटा है अभी,  अनायास!

सुक्रगुज़ार

ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर, पैरो से हमारे टकरा जाती कोई अजनबी लहर, और आसमान मे हौले से चाँद निकल आता! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता ! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर, अक्सर हमारे चाय की प्यालियाँ ट्रे मे टकरा जाया  करती और मेरे अख़बार के चंद पन्ने उसकी हाथो मे होते! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता ! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर, उसकी आखों से छलक पड़ते दो आह्लाद क आँसू, मेरी जेब से निकले  चंद सिक्के अनमोल हो जाते! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर, तेरे इम्तिहान मे हमारे लिए सवाल एक से होते, और मैं उसकी नकल करके पास हो जाता! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता! ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता गर, उसकी दुआओं मे कहीं हमारा भी नाम होता और शायद, मेरे  पास माँगने को कुछ भी नही.. ज़िंदगी ! मैं तेरा कुछ और सुक्रगुज़ार होता!!

दिल तो बेवकूफ़ है जी!

बड़ी हसरत थी कि किसी की मद भरी आखों पे लिखूं, कुछ बूँदों सी कमसिन,पर बारिस सी हसीन बातों पे लिखूं, पर ये साली feeling कभी आती ही नहीं! अक्सर लोगों को सुना था इश्क़ मे शायर होते, हम मुकम्मल शायरी की खातिर आशिक़ी कर बैठे! लगनी तो खैर दोनो ही सूरत मे थी! और फिर एक दिन! कहत किशोर सुनहु मेरे भाई, दिल की झोपड़ी मे साली feeling सी आई, ठीक वैसे जैसे  दातों के बीच कुछ रेशा सा फँस गया हो. आख़िरकार हमने भी गब्बर अंदाज़ मे उनसे हाथ माँग लिया, वो भी ठुकरा कर कह बैठे,अब तेरा क्या होगा कालिया? अपनी शोले भी रामू की आग बनकर रह गयी! तब से अब तक वो उस अंधेर झोपडे मे खामोश सी बैठी है, दाँतों मे अभी तलक़ कुछ फँसा हुआ है शायद.. अब ये feeling साली   जाती ही नही.!

बदलाव

Patratu Thermal Power Station तुम्हारा ख़याल है  ,कुछ भी तोह नहीं बदला वहीँ तोह खड़ा है वो सहतूत का पेड़ उन खट्टी शामों को शाखों  पे सजाये ये रहा चापाकल के पास इंसानों का जत्था कोक  से आज भी प्यास नहीं बुझती ना ! आज भी दिखाई देता है सड़क से  मेरे घर की  खिड़की का पल्ला बाहे फैलाए ये सड़क आज भी मिल जाती है उसी मैदान से पहली बार जहाँ घुटने  छिले थे मेरे ! कुछ तोह बदला है लेकिन झुक गया है जरा सा  सहतूत का पेड़, शायद उम्र की बोझे के तले! चापाकल  से  आखे अब  ऐसे देखती हैं , जैसे अजनबी हूँ इस राह क लिए! घुन बसते  हैं  खिड़की क पल्लों में आजकल पीपल की जड़े  भी तोह घुसपैठ कर रही है दीवारों से! क़दमों को भी गुमान होता है अपनी ताकत पर ठोकरों से भी  टूटने लगी है ये सड़क भी किनारों से! दिल कहता है फिर सब पहले सा  क्यों नहीं है? मैं कहता हूँ ,बेटे! सबकुछ वहीँ है बस  वही नहीं है!

बिखराव

दुनिया देखता हूँ तो , जान पाता हूँ बिखर गयी  है कुदरत भी ठीक मेरी तरह ! अकेला नहीं  हूँ मैं ! कटोरे में पड़ा था अब तलक वो  चुल्लू भर पानी फर्श पर बिखरा पड़ा  है ! पर सिमट रहा है वो ! लौटती लहरों पे खड़ा हूँ , जमी  न बचा पाऊं शायद  , कुछ रेत  बचा ही सकता हूँ,  अपने पैरो तले!

ख्वाहिशे..

बड़ी  कुत्ती  चीज़  हैं  ये  ख्वाहिशें   भी यूँ ही सफ़र कभी खतम नहीं होते   ना मिला तो सबकुछ, मिल गया तो  ख़ाक !

कुछ भी नही!

आखें खुली ज़मान देखा रोए ,मुस्कुराए समझा क्या? कुछ भी नही! तमन्ना की जतन किए पा लिया रहा क्या? कुछ भी नही! नैना मिले इश्क़ हुआ आँसू बहे मिला क्या ? कुछ भी नही! कोशिश की चूक गये नही मिला खोया क्या? कुछ भी नही! यादे है पछ्तावे हैं साँस रुकी बचा क्या? कुछ भी नही!