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आरजू

एक सड़क हो लंबी सीधी सी, और दोनों ओर वीराने हो, कुछ चेहरे हो अंजाने से, और भूले-बिसरे गाने हो. एक शाम हो कुछ ऐसी लंबी , के ना तिमिर थके , ना मिहिर थके, एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !! कुछ दूर चलूं तो दूर कहीं, एक झोपड़ हो सूना सूना, छत से लटकी हो लालटेन, खामोश सा हो कोना कोना, ना पास हो कुछ बेशक़ लेकिन, एक आस रहे , विश्वास रहे. एक ऐसे सफ़र की आरजू है  हमें !! हो भीगी-भीगी सी सड़के , कुछ बूंदे बस संवादी हो, कुछ यादें बासी-बासी हों, खो जाने की आज़ादी हो. कुछ ख्वाहिश हो मद्धम-मद्धम, एक प्यास रहे, आभास रहे. एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें !! एक विहग दिखे ऐसे नभ मे, मानो फिरता मारा-मारा, मेरी तरह पथ भूला सा, मेरी तरह कुछ आवारा!! इतनी शक्ति हो पंखों मे, के ना चाह थामे , ना राह थामे, एक ऐसे सफ़र की आरजू है हमें!!

बैठे - बैठे

यूँ ही बेकार बैठे बैठे जरा दूर एक बड़े पत्थर पर निशाना तय कर किया हमने एक के बाद एक जाने कितने कंकड़ हम फेकते रहे कुछ करीब से निकले , कुछ दूर से गुजरते गए, एक दो तो बिलकुल बीचोबीच जा लगे , कुछ जाने कहाँ ओझल से हो गए ! खैर ,वो पत्थर शायद ही डोला ना कंकड़ ख़तम हुए.. मुड़ कर देखा तोः वक़्त जरा दूर निकल गया था !!!