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बीमार कुत्ता

वो बीमार कुत्ता  जो दरवाजे के पास, गोल गोल चक्कर लगाता था,  शून्य के इर्द-गिर्द! गिर जाता था, फिर होश संभाल कर, घूमने लगता था, उसे जाना नही था कहीं, बस यूँ  ही काट देनी थी, अपनी बची खुची ज़िन्दगी। आज किसी भीड़ मे जब , एक ख्वाब से, हाथ छुड़ा कर घर आया, तो बड़ी देर तक जेहन में,  वो कुत्ता, गोल गोल घूमता रहा ।

उसके बचाव में

हाँ, बिल्कुल ज़ायज़ था, तेरा गुस्से मे तकिया फाड़ देना, और बिखेर देना रूई को, आसमान मे चारो तरफ, के आख़िर किस बिनाह पर, तुझे कोसते चलते हैं लोग, के जबकि मैने खुद देखी है, सीधी सटीक वर्गाकार खेतों की मेडे, और सलीके से चुपचाप बहती नदी, स्लो मोशन मे रेंगती मोटर कारे, और सन्नाटे मे डूबा एक पूरा सहर. ना कोलाहल, न कोहराम, ना अल्लाह , ना राम, ना दीवारे, ना दरवाजे, ना जनता, ना महाराजे, ना  शोर, ना संवाद, ना  गम, ना उन्माद. और जबकि मेरा जहाज़ , तो ज़रा सी उँचाई पे रहा होगा, पर तू तो  दूर,  कहीं दूर, बहुत उपर बैठता है ना! 

ज़िंदगी झंड

एक भेड़ चाल ज़िंदगी, एक भीड़ मे फँसी हुई, ना  जानता    कोई हमें, ना  हमको  जानना तुम्हे, ना बैर भाव है कोई, ना ही कोई संबंध है, ज़िंदगी ये झंड है, फिर भी बड़ा घमंड है. एक छोटी सी घड़ी मेरी, सोने कहाँ देती कभी, जो Snooze करके हम पड़े, जागा तो बोला..ओह तेरी! फिर सोचा अपना boss भी , कहाँ वक़्त का पाबंद है, ज़िंदगी ये झंड है, फिर भी बड़ा घमंड है. जो जैसे तैसे बस मिली,. हर सिग्नल पे रूकती चली, होता तो हमको गम अगर, जो बस की अगली सीट पर, बैठी ना होती वो कुड़ी, जी आइटम प्रचंड है, ज़िंदगी ये झंड है, फिर भी बड़ा घमंड है. एक इंतज़ार मैं कटी, अपनी तो सारी ज़िंदगी, वो तीस दिन की salary, जो बीस दिन मे ही उड़ी, बचे जो दस हैं और दिन, क्रेडिट-कार्ड का प्रबंध है, ज़िंदगी ये झंड है, फिर भी बड़ा घमंड है. नारी से कुछ तो नाता है, अपनी समझ ना आता है, दिल लेके अपना हाथ मैं, ज्यों ही गये हम पास में, वो क्यों थी चीख सी पड़ी, तू चूतिया अखंड है, ज़िंदगी ये झंड है, फिर भी बड़ा घम...

अब

वक़्त था जब ये जहाँ हमारा था अब तो सांस भी मांग कर लिया करते हैं वक़्त था जब इतराते थे अपने साये को देख कर भी अब तो आईने से भी मुह छुपा के चलते हैं वक़्त था जब मंजिलो तक पहुचने का हौसला था अब तो ठोकरों से ही टूट जाया करते हैं वक़्त था बेपरवाह ख्वाबो में जिया करते थे अब हकीकत से भी हम हँस के मिला करते हैं दरअसल उम्र बन जाते हैं कुछ लम्हे तजुर्बा बन जाते हैं कुछ फैसले बाजुए अब कर्म नही करना चाहती ये अब चेहरा छुपाने के काम आती हैं आहिस्ता आहिस्ता ही सही भ्रम टूट जाता है जिंदगी अपनी औकात पे आजाती है बस पहली कुछ दफा बाद दर्द होता है फिरजनाब आदत सी हो जाती है...