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तेरे जाने का गम न था...

तुम जा रही थी जब. इक दास्तां को अंजाम देकर, हालत से मजबूर इंसान को, बेपरवाही का इल्जाम देकर, कोसती रही थी तुम, मेरे संग बीते हर पल को, भूलाने की कोशिश में, याद करती उस कल को, कुछ जज्बातों से तुम अकेले लड़ी थी, कई सवालो के बीच तुम अकेले अरी थी, अफ़सोस था तुझे उन समझौतों पर, जो तुने मेरी खातिर किये, अफ़सोस था तुम्हे उन कुर्बानियों पर , जो तुने बस मेरे किये दिए. सब कष्टों को तुम, अश्कों में बहती गयी थी.. भविष्य के लिए एक सबक था, तू उसे दुहराती गयी थी. लेकिन मेरे परेशान दिल के पास, अश्कों का सहारा न था, आज आखो को मनाने वास्ते, मेरे पास कोई बहाना ना था.. क्योंकि तुमसे जुरा हर समझौता , मैंने अपनी खातिर किया, जो भी तुझे दिया, अपने खातिर दिया.. तुझपे एहसान किया होता तोः, कुछ खाहिश होती... मैंने तो रिश्ते में दिया, रिश्ते से लिया... उन बीते पलों का मुझे कोई गम नहीं... वो कुछ पल ही थी ज़िन्दगी,वो भी कम नहीं...

बूँद का सफर

एक बूँद थी मैं, नन्ही सी,मासूम सी ; अनंत जलराशि में ; कहीं कुछ तलाशती सी; लहर संग लहराती ; पवन संग इठलाती; किनारों को हौले से छू; पल में गुम हो जाती; अम्बर के विस्तार को ; अचंभित नैनो से ताकती; कल्पना के पंख लगाए; उन्मुक्त फलक में विचरती; किन्तु,कब इल्म था मुझे.. वक़्त दरिय सा बह रहा था; तमन्ना और सच का; अजीब सा मिलन हो रह था; अब आसमान मेर बसेर था; ऐसा प्रतीत हुआ जैसे, ये के नया सवेरा था. पर आज मैं आसमां के अंक से; जब भी झाकती हूँ ; ना वो किनारा दिखता है ना लहर ; ना वो मंजर दिखता ही,ना वो सहर; बस अरमानों संग खिलखिलाता पल नज़र आता है; वक़्त के परतों के बीच दबा कल नज़र आता है; किन्तु मुझे अस्तित्व और याद दोनों को सहेजना होगा.. अलविदा दोस्तों क्योंकि; अब क्षितिज की ओर चलना होगा~

कल की तलाश

कल को कल देखेंगे , चलो आज को निपटाते हैं, वक़्त के इरादों को कहाँ देखा है हमने , चलो इस पल में ही जी जाते हैं... कल जो आज के लिए सोचा था हमने, आज वो हम बिलकुल नहीं हैं .. फिर कल के लिए सपने संजोते , आज बिताना कितना सही है?? आज जो मिठास है इन खवाबो में, कल करवाहट बन जायेगी .. ये मजे देती अनकही ख्वाहिशे , कल अतीत की टीस बन जायेगी .. फिर क्यों इन लम्हों की जवानी को उस कल पर कुर्बान करते हैं , जो "कल " अपनी ही जुबां से , अपनी बेवफाई का एलान करते हैं ...

वो हसीं तन्हाई

अतीत की लकीरों से उभरती हुई, इक हसीं सी तस्वीर में सिमटी हुई , जब मिलती है वो मुझसे, जैसे दूर कहीं समंदर में , नज़र आये एक धुंधली कसती , वक़्त के पैमानों में , जैसे पुराने शराब की मस्ती , दिल में एक मीठी सी आहट, बेचैन लम्हों में एक अजीब सी राहत , उजाले में कहीं गम हो जाने का एहसास , अजनबी चेहरों में किसी खास की तलाश , जैसे करवाते बदलती लम्हों की वीरानियाँ ! वो शरारतों भरी बचपन की कहानियाँ , वो चटपटे दर्द के भारी भरकम पल, गलतियों के बीच छटपटाते बीते कल, खुद से दूर महसूस होती है वर्तमान की परछाई, नहीं पहचाना ?? "मेरी हसीं तन्हाई" ..............